Rasleela
निधिवन - वृन्दावन
आज भी राधा संग रास रचाते है कृष्ण !

भारत में आज भी आस्था और चमत्कार सभी का आदर किया जाता है। ऐसी ही एक जगह है निधिवन जिसके बारे में कहा जाता है कि आज भी हर रात को श्री कृष्ण और राधा जी गोपियों संग रास रचाते हैं।

वृन्दावन में स्तिथ निधिवन एक अत्यन्त धार्मिक और रहस्यमयी स्थान है।

वृंदावन को श्री कृष्ण और राधा का रास लीला स्थल माना जाता है। कई पुराण औऱ स्थानीय लोग दावा करते हैं कि वृंदावन के निधिवन नाम के जंगल में श्री कृष्ण ने राधाजी और अन्य गोपिंयों के साथ अलौकिक रास रचाया था। और मान्यता है कि आज भी भगवान श्रीकृष्ण एवं राधाजी गोपियों संग अर्द्धरात्रि के बाद यहाँ रास रचाते हैं। और रास के बाद निधिवन परिसर में बने रंग महल में आराम करते हैं।

जो भी देखता है हो जाता है पागल
वैसे तो शाम होते ही संध्या आरती के बाद निधिवन बंद कर दिया जाता है। और सब लोग यहाँ से चले जाते है इंसान छोड़िए, दिन के समय यहां रहने वाले पशु पक्षी भी यहां से चले जाते हैं। लेकिन फिर भी यदि कोई छुपकर रात के समय रुक जाता है और रासलीला के दर्शन कर लेता है तो वह तमाम सांसारिक बंधनों से मुक्त हो जाता है और उसका मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है।

ऐसे ही कलकत्ता का एक भक्त था उसके गुरु उसे निधिवन के बारे में बताया करते थे लेकिन उसको इस बात पर विश्वास नहीं हो रहा था। उसने निश्चय किया कि वृन्दावन जाऊंगा और ऐसा ही हुआ राधा रानी की कृपा हुई और वो वृन्दावन आ गया। वहाँ उसने बांकेबिहारी जी और राधा रानी के दर्शन किया लेकिन अब भी उसे निधिवन की रासलीला की बात का यकीन नहीं था।

उसने सोचा कि एक रात निधिवन रुक कर देखता हू शाम होने पर वो एक पेड़ की लता की आड़ में छिप गया जब पुजारी निधिवन को खाली करवाने लगे तो उनकी नज़र उस भक्त पर पड़ी और उसे वहा से जाना पड़ लेकिन अगले दिन फिर से वहा जाकर छिप गया और फिर से उसे पुजारियों द्वारा निकाला गया और आखिर में उसने निधिवन में ऐसा कोना खोज निकाला जहा उसे कोई नहीं ढूंढ़ सकता था। और वो सारी रात वही निधिवन में बैठा रहा और अगले दिन जब मंदिर के दरवाजे खुले तो पाया कि वो व्यक्ति बेसुध पड़ा हुआ है।

वह कुछ बोलने लायक नहीं था कुछ दिन बाद उसके गुरु जो कि गोवर्धन में रहते थे उन्हें इस बात का पता चला और तब उसके गुरूजी उसे गोवर्धन अपने आश्रम में ले आये आश्रम में भी वो बेसुध ऐसे ही रहा और एक दिन सुबह उस व्यक्ति ने गुरूजी से लिखने के लिए कलम और कागज़ माँगा और गुरूजी उसे कलम और कागज़ देकर मानसी गंगा में स्नान करने चले गए जब गुरूजी स्नान करके आश्रममें आये तो देखा की उस भक्त ने अपने प्राण त्याग दिए थे।

और उस कागज़ पर लिखा हुआ था गुरूजी मैंने यह बात किसी को भी नहीं बताई है, पहले आपको ही बताना चाहता हू, आप कहते थे कि निधिवन में आज भी भगवान रास रचाने आते है और मैं आपकी कही बात पर यकीन नहीं करता था,लेकिन जब मैंने निधिवन मैं साक्षात बांके बिहारी एवं राधा रानी के साथ रास रचाते हुए दर्शन किया और अब मेरी जीने की कोई भी इच्छा नहीं है और अब मैं जीकर करूँगा भी क्या ? श्याम सुन्दर की सुन्दरता के आगे ये दुनिया वालो की सुन्दरता कुछ भी नहीं है, इसलिए आपके श्री चरणों में मेरा अंतिम प्रणाम स्वीकार कीजिये।

वो पत्र बंगाली भाषा में लिखा हुआ है और आज भी मथुरा के सरकारी संघ्रालय में रखा हुआ है

रंग महल - आज भी सज़ती है श्री कृष्ण की सेज़
निधिवन का रंग महल आज भी अपने आप में कई रहस्य समेटे हुए हैं। मान्यता है कि भगवान श्री कृष्ण और राधा जी रास के बाद यही शयन करते हैं।
रंग महल में आज भी प्रतिदिन श्री कृष्ण और राधा के लिए पलंग सजाया जाता है। पलंग के बगल में जल का पात्र, पान, फुल,दातुन, माखन-मिश्री का प्रसाद और राधा जी के श्रृंगार का सामान रख दिया जाता है।

और जब सुबह रंग महल का पट खुलता है तो बिस्तर के देखने से प्रतीत होता है कि यहां निश्चित ही कोई रात्रि विश्राम करने आया था। फूल बिखरे, दातून गीली और पान चबाया हुआ मिलता है। और राधा जी के श्रृंगार का सामान बिखरा हुआ मिलता है। रंगमहल में भक्त राधा जी के श्रृंगार का सामान चढ़ाते है और प्रसाद स्वरुप उन्हें भी श्रृंगार का सामान मिलता है।

पेड़ की शाखाएं बढ़ते है जमीन की ओर
अक्सर हर पेड़ की शाखाएं ऊपर आसमान की ओर बढ़ती है परन्तु निधिवन के तुलसी के पेड़ो की शाखाएं नीचे की ओर बढ़ती है। यहाँ के लोग कहते हैं की निधि वन की पवित्र भूमि पर श्री कृष्ण के पवित्र चरण पडते हैं। इसी लिये तुलसी के पेड़ नीचे जमीन की ओर बढ़के यहां की पवित्र मिट्टी में ही समा जाना चाहते हैं। इसलिए यह के पेड़ हमेशा जमीन की ओर बढ़ते हैं। और हालात यह है की रास्ता बनाने के लिए इन पेड़ों को डंडे के सहारे रोका गया है।

पेड़ बनते है गोपियाँ
निधिवन के तुलसी के पेड़ आपस में गुंथी हुई होती है। इसके पीछे मान्यता यह  है कि जब कृष्ण संग राधा रास रचाते हैं तब यही पेड़ भगवान कृष्ण की गोपिकाएं बनकर उनके साथ रास रचाती हैं। सुबह होती है तो सब फिर तुलसी के पेड़ में बदल जाती हैं। साथ ही एक मान्यता यह भी है की वन में लगे तुलसी की कोई भी डंडी नहीं ले जा सकता अगर ऐसा करते हैं तो वो किसी न किसी दुखों के शिकार होते हैं।

वंशी चोर राधा रानी मंदिर और विशाखा कुंड
निधिवन में वंशी चोर राधा रानी का मंदिर है। यहां के पूजारी बताते हैं कि जब राधा जी को लगने लगा कि कृष्ण हर समय वंशी ही बजाते रहते हैं और उनकी तरफ ध्यान नहीं देते तो उन्होंने उनकी वंशी चुरा ली। और विशाखा कुंड के बारे में कहा जाता है कि जबश्रीकृष्ण सखियों के साथ रास रचा रहे थे तभी एक सखी विशाखा को प्यास लगी। कोई व्यवस्था न देख कृष्ण ने अपनी वंशी से इस कुंड की खुदाई कर दी विशाखा सखी ने पानी को पीकरअपनी प्यास बुझायी तभी से इस कुंड का नाम विशाखा कुंड पड़ गया।

बांकेबिहारी का प्राकट्य स्थल
विशाखा कुंड के पास ही बांकेबिहारी जी का प्राकट्य स्थल भी है। बांकेबिहारी जी ने स्वामी हरिदास जी महाराज के भक्ति संगीत से प्रसन्न होकर उन्हें स्वप्न दिया और बताया कि मैं तो तुम्हारी साधना स्थली में ही विशाखा कुंड के पास जमीन में छिपा हुआ हूं। स्वप्न के आधार पर हरिदास जी ने बिहारी जी को वहा से निकलवाया और उनकी सेवा पूजा करने लगे। कुछ समय में श्री बांकेबिहारी जी के नवीन मंदिर बाके बिहारी मंदिर की स्थापना की गयी और प्राकट्य मूर्ति को वहा स्थापित किया गया।स्वामी हरिदास जी की समाधि निधि वन परिसर में ही है।

आसपास के बने मकानों में नहीं हैं खिड़कियां
निधिवन के आसपास बने मकानों के निवासी बताते हैं कि शाम के बाद कोई भी इस वन की तरफ नहीं देखता। जिन लोगों ने देखने का प्रयास किया या तो अंधे हो गए या फिर उनके ऊपर आपदा आ गई। आसपास के मकानों में खिड़कियां नहीं हैं और जिन मकानों में खिड़कियां हैं भी वो लोग शाम सात बजे मंदिर की आरती का घंटा बजते ही खिड़कियां बंद कर लेते हैं। कुछ लोग तो अपनी खिड़कियों को ईंटों से बंद भी करा दिया है।

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